Uttarakhand 30 to 31 degree north latitude-active,complex and important

“उत्तराखंड में 30 से 31 डिग्री उत्तरी अक्षांश पेटी– अति जटिल , सक्रिय एवं महत्वपूर्ण “

Prof. H.P.Bhatt
Ex Director campus
Ex HOD Geography
Ex Dean Earth Sciences
HNB Garhwal central university, srinagar

ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव सर्वत्र हे विश्व स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग , हिंद महासागर dipole, पश्चिमी विक्षोभ और lanino का प्रभाव , आर्कटिक एवं अंटार्कटिका ग्लेसियर और सी आइस के पिघलने के फल स्वरूप भारत के उत्तरी और उत्तरी पश्चिम भाग में अधिक बरसा हो रहीं हैं । इसी के कारण उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, और जम्मू कश्मीर में भारी बरसा हो रहीं हैं और आगे भी होगी ।

ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव सर्वत्र हे किन्तु दुनिया के अलग अलग भागों में प्रभाव भी भिन्न भिन्न हे l
30 से 31 डिग्री के मध्य का अक्षांशसीय जोन हिमालय पर्बत में एक संक्रमण पट्टी हे जिसका ट्ररोपिक से एक्सेस हीट को ठंडे धुरबीय क्षेत्रों की ओर खिसकाने में महत्त्वपूर्ण योगदान है । नवीनतम अनुसंधानों के अनुसार इस अक्षांशसीय पट्टी में क्षोभ मंडल , भूमध्य रेखा की तुलना में अधिक तीव्रता से गरम हो रहा है और जेट स्ट्रीम को धुरबो की तरफ धकेल रहा हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के साथ साथ क्षेत्रीय व स्थानीय दशाओं की भूमिका अति महत्वपूर्ण हे lयही वजह है कि उत्तराखंड में भारी से भारी बरसा एवं भारी भूस्खलन एवं मास वास्टिंग , हो रहा है
30 डिग्री से 31 डिग्री उत्तर अक्षांश के मध्य फैला क्षेत्र उत्तराखंड का सबसे अधिक संवेदनशील , भूगर्भिक दृष्टि से अत्यंत सक्रिय प्रकृति का ,विविध भूगर्भिक संरचना और भौगोलिक विशेषताओं वाला क्षेत्र हे,इसकी पर्वत श्रेणियां उत्तर पूरब से दक्षिण पश्चिम की ओर फैली हुई हैं, जिससे यहां बरसा छाया परदेश भी नहीं हैं ,अधिकांस भागों का ढाल 20 से 8o डिग्री है इसमें उत्तरकाशी , टिहरी रुद्रप्रयाग , चमोली और देहरादून सम्पूर्ण जनपद तथा पौड़ी एवं पिथोरागढ़ के कुछ भाग शामिल हैं अर्थात उत्तराखंड का सबसे महत्वपूर्ण बड़ा भौगोलिक भाग है इस का लोअर हिमालय से लेकर उच्च हिमालय तक फैलाव है, ,इन्हीं जनपदों से MCT गुज़रती हैं,सर्वाधिक भूकंप भी इसी भाग में आए हैं और भूकंप के सब से बड़े विनाशकारी जॉन में हैं ।अधिकांश बस्तियां 2000 से 5000 फीट के बीच इसी में अवस्थित हैं उत्तराखंड की बर्तमान एवं भावी राजधानी – देहरादून और गैरसेन इसी में है । बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री ( यमुनोत्री की स्थिति 31.04 डिग्री पर हे) भी इसी पट्टी में हैं और इसी में सर्वाधिक जल परियोजनाएं, हैं ।,इसमें सर्वाधिक बरसा एवं भूस्खलन हो रहे हैं ।इन्हीं में चार धाम यात्रा सड़क 898 किलोमीटर का लगभग 85% हिस्सा इसी जोंन में हैं। स्पष्ट रूप से सर्वाधिक जटिल, सक्रिय एवं महत्व पूर्ण पेटी हैं
यहां की भूगर्भीय एवं भौगोलिक दशाओं के प्रभाव को
मानवीय बिकासओनमुखी गतिविधियों ने भयावह आपदाओं का रूप देने मे कोई कसर नहीं छोड़ी है ।….परिणाम हे अगस्त माह की त्रासदी l

Previous Article

Dharali uttarkashi-विद्यमान परिस्थिति एवं संभावनाएं

Next Article

उत्तराखंड-एक रेकॉरिंग लैंडसलाईड स्टेट

Write a Comment

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *