Dharali uttarkashi _Disaster मानवीय क्रियाएँ भी जिम्मेदार Prof.H.P.Bhatt

  1. Dhrali आपदा-मानवीय क्रियाएँ भी जिम्मेदारProf.H.P.Bhatt

    5अगस्त 2025 को dharali उत्तरकाशी में जो फ्लैश बाढ़ आई उसके संबंध में विज्ञानियों के अलग-अलग राय है कुछ का मनाना है कि यह बादल फटने का कारण है कुछ का मनाना है कि अतिधिक बारिश के कारण चट्टानों में पानी का रिसाव हो गया था जिसकी बाद चट्टानों का खिस्काव होने से फ्लैश बाढ़ आई l कुछ का मनाना है कि बादल फटने के कlरण ,कुछ का मानना है कि झील टूट गई थी ।इसके एक नहीं दो या दो से अधिक कl रण प्रतिबिम्बित होते हैं।

    इस क्षेत्र की नदियाँ पूर्व व्रती प्रवाह प्रणाली का अनुकरण करती है । अर्थात नदी अपने पुराने मार्ग का अनुसरन करती है खीर गंगा के साथ भी यहीं हुआ खिर गंगा का जो पुराना मार्ग था, वहाँ आवासी और वाणिज्यिक भवनों का निर्माण हुआ हे ।बाढ़ के समय नदी रास्ते में पड़ने वाले समस्त निर्माण को बहl कर ले गई। इसका साफ सुथरा उधारन यह है कि नदी जब सामने से आ रही थी तो उसके द्वारा सेब के बगीचों में प्रवेश न करके राइट् टर्न ले लिया था जलवायु परिवर्तन और सतत विकास के लिए विश्व लेवल पर प्रयास किए जा रहे हैं । उत्तराखंड सरकार के द्वारा जलवायु परिवर्तन के लिए कार्य योजना बनाई गई है uapcc (उत्तराखंड एक्सन प्लान फार climate change) पर काम हो रहा है अभी हाल के वर्षों में केंद्र सरकार ने ग्लेशियर लेक आउटब्रेस्ट बाढ़ ( GLOFs ) को नियंत्रित करने के लिए चार राज्यों का चयन किया जिसमें उत्तराखंड एक राज्य था ।
    योजनाओं और परियोजनाओं में किसी भी लेवल पर कमी नहीं है अगर कमी है तो केवल उनके सही रूप में सुचारु रूप से उचित समय पर कार्यान्वयन की । जब ऐसा होगा तभी धरौली वाली घटनाओं से मानव जीवन बचा सकते हैं हिमालय प्रारम्भ, से ही विकास बनाम पर्यावरण के संकट और विवाद में रहा है
    जैसा कि वर्तमान समय में हम anthropocene भूवैज्ञानिक युग में रह रहे हैं जो एक प्रस्तावित भूवैज्ञानिक ईरा है ।इसे मानव जनित युग कहा जाता है ।जिसमें मानव सूक्ष्म दृश्य ( दृष्टी) आर्थिक विकास नियोजन और आर्थिक क्रियाओं को संचालित कर रहा है। जिसका परिनाम थराली जैसी विपदा है इसे भी भयावह स्थिति भविष्य में पैदा होने वाली हैं कियो कि मानव तेजी से misanthropocene युग में जारहा है जिसे मानव द्वेष पूर्ण युग कहा गया है ।जिसमें मानव की गतिविधियां अत्यधिक विनाशकारी एव भयंकर होंगी ।प्रकृति का मानवीकरण हो रहा है उसी के परिनाम स्वरूप हिमालय में प्राकृतिक आपदाएं अधिक मात्रा में और अधिक गहनता से आ रहीं हैं जब कि मानव का naturalization होना चाहिए। जिसके फलस्वरुप हम हिमालय की और मानव की सुरक्षा कर सकते हैं-

    1 वैज्ञानिक एवं acedamiciann और लोकल लोगों के सुझावों को गंभीरता के आधार पर sustainable विकास के अनुरूप लागू करें
    2 स्थानीय लोगों को अपने निवास एवं कृषि व्यवसाय और अन्य व्यवसाय का प्रसार करते समय अपने क्षेत्र एव गांव के भौगोलिक इतिहास एव भविष्य को ध्यान में रख कर प्रसार करना होगा
    3 प्रकृति एव सफल परम्परा युक्त को ध्यान मे रख कर भवन निर्माण करना होगा ।ग्रामीण क्षेत्र में आवासीय एव व्यावसायिक भवनों के नक्शे मानक अनुसर अधिकृत विभाग से पास करवाना अनिवार्य हो ।
    4 क्षेत्र में “नियंत्रित पर्यटन “हो पर्यटन के नाम पर पर्यावरणीय अराजकता न हो।
    5 जो बस्तियां संवेदनाशील हैं उनको अन्यत्र शिफ्ट किया जाए।
    6 रिज से नदी (आर2आर )की संकल्पना एव दृष्टिकोण के आधार पर हिमालय क्षेत्र के लिए योजनाएं बने और उनका प्रबंधन हो ।
    “7 ग्रीन पिस” इंडिपेंडेंट संगठन ने साउथ अमेरिका के चिली देश में एक ‘ग्लेसियर रिपब्लिक ‘ देश घोषित किया है जिसे अभी UNO ने कोई मान्यता नहीं दी है लेकिन इसके पीछे उदेश्य सिर्फ हिमनदों का संरक्षण हे। हिमालय में भी ग्लेसियर संरक्षण हेतु सख्त योजनाओं एवं नियमों की जरूरत हे।
    हिमालय क्षेत्र में ऊंचाई बढ़ाने के साथ-साथ भुगर्भिक , भौगोलिक एव पर्यावरणीय संवेदना भी बढ़ती है इसलिए हमन अपने एक्शन में भी अति संवेदनाशील होना होगा। आपदाओं के कारण हिमालय ‘त्रस्त हिमालय ‘ बन चुका हे।
    अब केवल एक्शन प्लान नहीं ब्लकि प्लान इन एक्शन की जरूरत हे। तभी हिमालय और हिमालय वासियों को सुरक्षित रखा जा सकता हे। अन्यथा कौन भुगते ग।-आप, हम, सब।

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Dharali uttarkashi-विद्यमान परिस्थिति एवं संभावनाएं

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