“Dharali,उत्तरकाशी –विद्यमान परिस्थिति और सम्भावनाएं “
Prof.H.P.Bhatt
Ex Director campus
Ex HOD Geography HNB Garhwal central university, srinagar Dharali प्रभावितों के साथ सब की गहरी सम्वेदना हे। माननीय प्रधानमंत्री जी के harshil भ्रमण के दौरान “घाम तारों टूरिज्म ” को महत्व और बढ़ावा देने की बात कही थी। किन्तु dharali की आपदा के बाद वहाँ के लोगों के लिए तो “अब घाम तापl /अब घाम ही त तापन ” अर्थात जब/सब कुछ नहीं रहा। ( garhwali में घाम तापने का नेगेटिव अर्थ भी होता है) प्रकृति की मार के बाद उनकी घाम तापने वाली स्थिति बन गई हैं इस प्राकृतिक आपदा जिसके लिए हम भी बराबर जिम्मेदार है का शीघ्र समाधान जरूरी है
थराली,उत्तरकाशी जैसी हिमालय आपदाओं के संबंध में सरकारी घोषणाएं हो रही हैं और आगे भी होंगी। प्रभावितों कुछ राहत दी जा रही हे और उनको स्थाई राहत की मुख्य जरूरत हे उनका गाँव अन्य जगह बसाने की। वैज्ञानिक द्वारा लेख लिखे जाएंगे। टीवी पर वैज्ञानिकों की और अकैडमिशियन द्वारा चर्चायें की जाएंगी l यह हो भी रहा हैं इस के संबंध में सेमीनार/ संगोष्टियां आयोजित की जाएंगी और उसके बाद जो भी प्रोसिडिंग होंगी सब एक डस्टबिन में चली जाएंगे, उन पर कोई ध्यान नहीं दिया जाएगा और यह सारी घटनाएं कुछ समय बाद भुला दी जाएंगे। किंतु प्रभावितों का कभी न भरने वाला दर्द हमेशा उनके साथ-साथ चलता रहेगा।
इसप्रकार की घटनाएं जब दुबारा से होगी तोहम पुन जागृत हो जाएंगे। वैसे भी इस प्रकार की घटनाओं के बारे में कई प्रकार की राय और मशवरे आते जाते हैं और आते जाते रहेंगे। वैसे भी कहा जाता है कि भारत में पर कैपिटा राय की दर सर्वाधिक है। हमें ऐसा क्यों हुआ, यह जानना तो जरूरी है और ठीक भी है किंतु इससे और भी जरूरी हे जानना की क्यों ऐसा ना हो अर्थात इस प्रकार की घटना उसके बचने के लिए हमें क्या करना है तो क्यों ऐसा ना हो का जवाब है कि हमारे अपने कार्य प्रणाली में परिवर्तन और सुधार । इस पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की इच्छा की जरूरत है।हमें प्राकृतिक दशाओं और प्राकृतिक नियमों को समझना जरूरी है। उनकी उपेक्षा कर विकास संभव नहीं है और अगर इसके बाद भी विकास किया जाता है तो उससे हमें अधिक हानि का सामना करना पड़ेगा। उदाहरण के लिए जापान जैसे विकसित देश के एक द्वीप में 20 जून 2025 से लेकर के 10 जुलाई 2025 के मध्य लगभग 2200 भूकंपीय झटके महसूस किए गए। जापान जैसे एडवांस देश में वहां की प्राकृतिक दशाओं के साथ मानव समायोजन करके चलता है ना कि उसकी विपरीत चल करके । हमें प्रकृति के साथ समझौते करके ही चलना होगा।मानव का नेचर के साथ का सम्बंध चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक कंट्रोलर जैसा होता है जो आने वाले ट्रैफिक को कुछ समय के लिए रोक सकता है। उनके मार्ग को बदल सकता है किंतु उनका जो गंतव्य स्थान है उनको जहां जाना है, उसे नहीं बदल सकता है। उसी प्रकार मानव प्रकृति के द्वारा दी गई दशाओं में कुछ परिवर्तन कर सकता हे किन्तु पूरी तरह बदल नहीं सकता हे aur जब ऐसा कर रहा है तो आपदाएं आ रही हैं अतः नेचर को फॉलो करें। उसके हिसाब से चले उनके ऊपर विजय प्राप्त करने की कोशिश न करें। उनकी दिशा बदलने की कोशिश ना करें। इसी में समझ है और इसी में मानव का हित संभव है और आज मानव प्रकृति के साथ सामंजस नहीं बल्कि उसके ऊपर विजय प्राप्त करने की चेष्टा कर रहा है।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। पृथ्वी पर या तो चीज बढ़ रही हैं
गाँवों का भी भौगोलिक , भूगर्भीय और पर्यावरणीय मानकों के आधार पर नियोजन आवश्यक है:
1.गांव का क्षेत्रीय आकार और फैलाव सुनिश्चित कर दिया जाए। गांव में जो भवन निर्माण की संख्या और उनका वर्टिकल तथा होरिजेंटल फैलाव कैसा और कितना हो ,यह भी तय करना होगा 3.सीमेंट का प्रयोग केवल अति आवश्यक सीमा तक उपयोग हो तथा उपयोग की अनुमति दी जाए। 4.परंपरागत भवन निर्माण सामग्री एवं तकनीकी का प्रयोग हो।
5.इसके लिए स्थानीय पटवारी को अधिक शक्तियां देकर गांव के अनावश्यक, अनियमित और मानकों के बिपरीत विकास एवं प्रसार को रोकना होगा ।
6. प्रभावितों का भौगोलिक एवं भूगर्भीय दृष्टि से सुरक्षित स्थान पर पुनर्वास किया जाए।
7.उनके आर्थिक व्यवसाय की पुनर्स्थापना एवं रोजगार उपलब्ध कराया जाए। सेब के बगीचों से उत्पादन की उचित व्यवस्था एवं संरक्षण हो ।
8.रोजगार में प्राकृतिक आपदा प्रभावितों के लिए वन टाइम रोजगार आरक्षण की व्यवस्था की जाए।
जो की अति आवश्यक दिखता है ।
9.आपदा से क्षतिग्रस्त भाग है। भविष्य में बस्ती न बसाई जाए। बल्कि plantation किया जाय ।
हम आर्थिक रूप से धीरे-धीरे संपन्न हो रहे हैं किंतु पर्यावरणीय रूप से हम अत्यधिक गरीब और भिखारी बनने की दिशा की ओर बढ़ रहे हैं जिसके फलस्वरूप की मानव का जीवन कदापि सुरक्षित नहीं है और नहीं होगा। मुझे एक अकैडमिशियन का कथन बार बार याद आता है कि :
‘I was hungry, and you filed a report of my plight .
I was homeless and you formed a committee to investigate my underprivileged situation .
I was sick and you organi zed a seminar.
You did every thing but yet still I am hungry, homeless and sick .
ऐसा ना हो कि हिमालय में होने वाली जो भी आपदाएं हैं या जो भी लोग प्रभावित हैं, उनकी स्थितियां आई एम स्टिल हंगरी ,होमलेस एंड सिंक वाली स्थिति न बनी रहे।
अधिकांशत यही परिस्थितियl देखने में आती रहती हे जो हमारे प्रयासों की असफलता का दर्पण है। जरूरत हे- एनफारमेंसन +इंटीग्रेसन +इनीसीएसन + ईमपालीमनतेसन की